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बाबू गेंदा सिंह जी की पुण्यतिथि पर CMD उपेन्‍द्र राय का संबोधन
बाबू गेंदा सिंह की पुण्यतिथि: एक किसान, एक सेनानी, एक महापुरुष...जिन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा

हरिशंकर राय जी से मेरा परिचय हुआ। सुरेंद्र राय जी, नौरंग सिंह जी, श्रीमती चंद्रप्रभा पाण्डेय जी (अध्यक्ष, महिला मोर्चा), वासुदेव राय जी, विश्वजीत राय जी, वरुण राय जी, अजय राय जी (किसान मोर्चा), दुर्गेश राय जी (राष्ट्रीय सचिव, ब्रह्मर्षि मंच), अविनाश राय जी (जिला अध्यक्ष, ब्रह्मर्षि मंच), सुमित त्रिपाठी, शिक्षक सुरेंद्र राय जी। अध्यक्षता पूर्व विधायक रजनीकांत त्रिपाठी जी कर रहे हैं। विशिष्ट अतिथि किरण राकेश जयसवाल जी। और सभी सामने बैठे हुए हमारे भाई-बहन, आप सबका बहुत अभिवादन।

किसान नेता होने के साथ-साथ किसानी को एक नई परिभाषा देते हुए कहा जाता है कि जब कोई महापुरुष पैदा होता है, तो अपने समय से पहले पैदा होता है और समय के आगे देखता है। बाबू गेंदा सिंह जी के बारे में मेरा परिचय जब पहली बार पुनित का संदेश आया था, आज से तीन-चार साल पहले यहां आने के लिए, तो उस समय मैंने गेंदा सिंह जी के बारे में पढ़ा था। क्योंकि अगर आप किसी कार्यक्रम में जा रहे हैं, तो उस महापुरुष के बारे में थोड़ा जानना बेहद जरूरी हो जाता है। और बड़ी कमाल की बात है कि 13 नवंबर को उनका जन्म हुआ था और 15 नवंबर को उनकी मृत्यु हुई थी। तो उनके जन्म और मृत्यु के बीच मात्र दो दिनों का फासला है।


गुरु नानक देव कहते थे कि जब तुम जीवन प्राप्त करते हो, तो समझना कि घड़ी की सुई 12 पर आ गई है, यानी सेकंड, मिनट और घंटे की सुई एक जगह मिल जाती है। और जब मौत होती है, तो भी समझना कि घड़ी की सुई 12 बजे पर आ गई है। यानी जब शरीर छूटता है, तो भी मिनट और घंटे की सुई एक जगह आ जाती है।

उनके भक्तों ने पूछा कि भगवन, ऐसा क्यों होता है कि घड़ी की सुई 12 पर आ जाती है? तो नानक देव ने कहा कि माँ-बाप बच्चे पैदा करने के लिए अवसर पैदा करते हैं, आत्मा कहीं से प्रवेश करती है। और दुनिया में कोई माँ-बाप नहीं बता पाया कि वह आत्मा कब और कैसे माँ के अंदर प्रवेश कर गई। कोई इस परम विराट से आपके अंदर उतरता है, यानी द्वैत अद्वैत हो जाता है, दो एक हो जाते हैं।

माँ के अंदर आत्मा आई, बच्चे की कोख में, तो घड़ी की सुई 12 बज गई। और जब वही बच्चा बड़ा होकर अपना शरीर छोड़ता है, तो भी घड़ी की सुई 12 पर हो जाती है। क्योंकि कुछ छूटता है और कुछ परम विराट में मिल जाता है। ठीक वैसे ही जैसे बारिश होती है और बूंद का पानी समंदर में समा जाता है, फिर कोई उपाय नहीं कि उस बूंद के पानी को छानकर निकाला जा सके।

बाबू गेंदा सिंह जैसे लोग अपने समय से आगे देखने वाले लोग थे। 1952 में वे विधायक बने। 1948 से 1964 तक सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। फिर वे कांग्रेस पार्टी में लंबे समय तक रहे। विधायक भी रहे, सांसद भी रहे, मंत्री भी रहे। तो जाहिर सी बात है कि उनकी दृष्टि अपने समय से बहुत आगे की थी। उस वक्त में आप सोचिए कि वे जर्मनी गए अध्ययन करने के लिए। उस समय कितने लोग जर्मनी जाते होंगे। जाहिर सी बात है कि पानी के जहाज से नहीं गए, प्लेन में बैठकर गए। अपने समय की रफ्तार से आगे थे। वे एक सायादार पेड़ थे।

हमारे दोस्त थे मुन्नवर राणा जी, जो अब नहीं हैं, जो हिंदुस्तान के बड़े शायर रहे। उनका एक शेर है:

हम सायादार पेड़ जमाने के काम आए,
जब सूखने लगे तो जलाने के काम आए।

गेंदा सिंह जी एक सायादार पेड़ थे। जब जिंदा रहे, तो समाज की सेवा करते रहे। जब अपना शरीर छोड़कर चले गए, तो इतना कुछ बताकर चले गए कि आज भी हमें मजबूर करता है कि 15 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि के 48 साल बाद भी यहां बैठकर हम चिंतन-मनन कर रहे हैं।

किसी और शेर का जिक्र कर दे रहा हूँ:

पुराने पेड़ नया हौसला तो क्या देंगे?
बुजुर्गों से मिलते रहिए, दुआ देंगे।

तो बुजुर्गों से मिलने का भी एक बड़ा फायदा है। उनके साथ रहने का, जीने का, उनके साथ समय बिताने का।

देखिए, रावण जितना अहंकारी और व्यभिचारी था, लेकिन उसकी ज्ञान की तुलना स्वयं भगवान राम ने भी की कि इसके जितना ज्ञानी मैं भी नहीं हूँ। अगर कोई हमारे कुल में ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, तो रावण के पास जाए। तो लक्ष्मण जाकर रावण के सिरहाने खड़े हो गए, तो रावण बोला ही नहीं। कहा जाता है कि विनम्रता के बाणों को अहंकार की कोई ढाल रोक नहीं सकती। अगर आप जीवन में विनम्र हैं, तो आपके सामने कोई मुश्किल आती भी होगी, तो मुश्किल दूर हो जाएगी। और उस मुश्किल को दूर करने का आधार और कारण आप ही बनेंगे।

भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा कि जब किसी से कुछ प्राप्त करना हो, तो हमें याचक बनकर जाना चाहिए। आप जाकर सिरहाने खड़े हो गए, ज्ञान लेना चाहते हैं, तो पैरों की तरफ जाकर खड़ा होना चाहिए। और जब पैरों की तरफ जाकर खड़े हो गए, तो रावण ने लक्ष्मण को दीक्षा दी। यह भी बड़ी अनोखी कहानी है कि जिस रावण को दोनों भाइयों ने मिलकर मारा, उसी से दीक्षा ली। यानी यह बात बताती है कि हमारे यहां बहुत गहरे में यह परंपरा है कि अगर हम किसी से सहमत नहीं हैं, फिर भी असहमत होते हुए भी हमें उसका साथ देना है अच्छे कार्यों के लिए।

जैसे हमारे यहां आदि शंकराचार्य नहीं होते, तो इस भारत भूमि पर जितने आक्रांता आए, एक मंत्र बची होती, न एक पोथी बची होती। उनको दोबारा पुनर्जीवित करने का काम आदि शंकराचार्य ने किया। और आदि शंकराचार्य ने भगवान बुद्ध से 100 में 90 जगहों पर अपनी असहमति जताई।

हमारे देश में शैव और वैष्णवों को लेकर एक बड़ा मतभेद रहा। लेकिन आदि शंकराचार्य ने जो बुद्ध के बारे में स्तुति लिखी, वैसी असहमत रहने वाले व्यक्ति ने किसी के बारे में इतनी सुंदर स्तुति नहीं लिखी। (क्योंकि वह संस्कृत में है, इसलिए मुझे कंठस्थ नहीं है। कभी था — 1994 में जब मैं दसवीं क्लास में था, तो पूरा कंठस्थ था। लेकिन अभ्यास बहुत सारी चीजों का समय और वक्त की जरूरतों के हिसाब से छूट जाता है, तो चीजें भूल भी जाती हैं।)

अंग्रेजी में कहावत है: We should always agree to disagree.

सहमत और असहमत होने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। जहां सहमति नहीं है, वहां भी असहमति हो सकती है और जहां सहमति है, वहां भी असहमति हो सकती है। इतना उदार व्यवहार और विचार हमारा होना चाहिए।

बाबू गेंदा सिंह जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। स्वर्ण अक्षरों में उनका नाम हमेशा के लिए अमर है।

मैं भी इस गांव से आता हूँ — गाजीपुर जिले के शेरपुर गांव से। उस गांव में भी 200 लोगों को फ्रीडम फाइटर के रूप में चिन्हित किया गया था सरकार ने। और 18 अगस्त 1942 को मेरे परिवार समेत हमारे गांव के बड़े बुजुर्गों ने शहादत दी — झंडा फहराते हुए मोहम्मदाबाद तहसील पर। आठ लोग वहीं के वहीं मारे गए। और उसके अलावा भी कुछ लोग ऐसे थे जो गोलियों से बहुत घायल हुए, लेकिन परमात्मा ने उनकी आयु लंबी लिख रखी थी, तो उन्होंने उस समय तक अपनी जिंदगी उन गोलियों के साथ व्यतीत की और 30-40 साल जिंदा रहे।

हमारे देश की आजादी की लड़ाई में एक-एक जगह पर, एक-एक गांव पर, एक-एक तहसील पर, एक-एक जिले पर जब असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ, तो मुझे लगता है कि इस देश की जो तरुणाई थी, वह प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी।

मैं हाल ही में पढ़ रहा था कि जब नेहरू जी ने प्रधानमंत्री की शपथ ले ली थी, तो पता किया गया कि इस समय गांधी जी कहाँ हैं? तो पता चला कि गांधी जी दिल्ली के किसी हरिजन बस्ती में झाड़ू लगा रहे थे (सफाई के दौरान)।

महात्मा गांधी के बारे में बहुत सारे आलोचक भी रहे। मैं भी पहले अपने शुरुआती दिनों में, आठवीं, नौवीं, दसवीं क्लास में था, तो बहुत फॉलोअर नहीं था। तब मुझे गरम दल के लोगों की बातें बहुत अच्छी लगती थीं — सुभाष बाबू की, भगत सिंह की। बातें अभी भी अच्छी लगती हैं, क्योंकि ऐसा निर्दोष बलिदान या ऐसा मौन बलिदान भगत सिंह और सुभाष बाबू जैसे क्रांतिकारियों ने, खुदीराम बोस जैसे लोगों ने, चंद्रशेखर आजाद जैसे लोगों ने, राम प्रसाद बिस्मिल ने दिया — यह कोई साधारण बलिदान नहीं था।

जब कभी फिल्म के रूप में ही हम देखते हैं — शहीद भगत सिंह पर तीन-चार फिल्में आ चुकी हैं। लेकिन मैं तो एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि कोई भी उनमें से एक फिल्म देखूँ और फूट-फूटकर न रोया हूँ। ये कैसे लोग थे? क्या दीवानगी थी इनके अंदर? क्या चेतना थी? कैसे सब चीजों को किनारे रखकर, स्वार्थ से ऊपर उठकर देश के लिए अपना सब कुछ लुटा देने के लिए — यहां तक कि फांसी के फंदे को चूमने का साहस — एक बहुत ही निर्दोष चेतना और चित्त से हल्की चेतना में ही आता है, जिसको कोई चीज बोझिल न कर सके।

आप देखते हैं, आसमान में वही गुब्बारा उड़ता है जिसमें हीलियम या हाइड्रोजन नामक गैस भरी होती है। इसी गुब्बारे में हम मुंह से भी हवा भर देते हैं, तो वह जमीन नहीं छोड़ता। क्यों? सिर्फ एक कारण से — उसका चित्त भारी हो जाता है। ऐसे लोग जो फांसी के फंदे को चूम लेते हैं, उनका चित्त बड़ा गहरा और हल्का होता है। और आसमान की ऊंचाई वही व्यक्ति छूता है जो निर्भार होता है, जिसके अंदर कोई ग्रज नहीं होता।

जैसे कोई बुद्ध के मुंह पर आकर थूक दे, तो बुद्ध जैसा व्यक्ति अपना आँचल निकाले, पोंछे और मुस्कुराते हुए पूछे कि आपको कुछ और कहना है? और थूकने वाला फूट-फूटकर रो पड़े। और तैयारी करके आया हो कि बुद्ध ये कहेंगे तो मैं ये कहूँगा, ये जवाब देंगे तो मैं ये जवाब कर दूँगा। लेकिन बुद्ध ने ऐसा कोई जवाब नहीं दिया। बुद्ध मुस्कुराए। लोगों ने बुद्ध से पूछा कि आपने जवाब क्यों नहीं दिया?

बुद्ध बोले, "पूरे जीवन यही तो तपस्या की है कि जवाब नहीं देना है। मैं उससे बहुत दूर निकल आया हूँ। जवाब देता तो मैं उसी के बराबर चला जाता। फिर मैं किस बात का बुद्ध? और फिर मेरी इतने साल की तपस्या का मतलब क्या है? जवाब देते ही मैं उसमें उलझ जाता। मैंने सारा ज्ञान ही पाया है कि अब उलझना नहीं है कहीं। जो उलझा हुआ है, उसे सुलझाना है।"

तो ऐसे लोग, बाबू गेंदा सिंह जैसे लोगों की याद में एक और शेर है, जो बचपन में हमारे गांव में 18 अगस्त को जब भी शहीदों की पूजा होती थी, तो पढ़ा जाता था। मुझे वह शेर अभी भी याद है:

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशान होगा।

बाबू गेंदा सिंह जी का पुण्य है कि उनके किए गए कामों की कृतियाँ हैं। कि हम आज यहां इकट्ठा हैं और उस तरह से उन्हें याद कर रहे हैं। याद हम किसको करते हैं? जिसकी याद रहकर आती है, जिसको भुलाया नहीं जा सकता। हम उसको याद नहीं करते जिसने आपके जीवन में, समाज में, देश में, आपके मन पर कोई छाप न छोड़ी हो।

हम याद उसी को करते हैं जो याद के योग्य होता है। ज्ञानी कहते हैं कि भगवान श्री कृष्ण अपने समय से करीब 5000 साल पहले पैदा हो गए। तो कृष्ण तो कृष्ण थे। कृष्ण जैसे दूसरा इस पृथ्वी पर कभी उतरा नहीं, न उतरेगा। लेकिन मैं मानता हूँ कि बाबू गेंदा सिंह जी जैसे लोग कृष्ण की छोटी-छोटी आत्माएँ हैं और जो लोग कृष्ण से प्रभावित हैं, राम से प्रभावित हैं, विवेकानंद से प्रभावित हैं, तमाम लोगों से प्रभावित हैं — तो आप सोचकर देखिए कि इनके अंदर भी वो बड़ी आत्माओं के रूप में उनकी आभा जरूर उतरी होगी।

महात्मा बुद्ध ने कहा था कि मैं मैत्रेय के रूप में पृथ्वी पर आऊँगा। इस पर बड़ी बहस हुई। बुद्ध अगर किसी कोख से जन्म लेते मैत्रेय के रूप में, तो कम से कम दुनिया को पता जरूर चलता। लेकिन बुद्ध के 3000 साल बीत गए, क्यों नहीं आए? रिसर्च और विश्लेषण यह बताता है कि बुद्ध जैसी बड़ी आत्मा को धारण करने लायक कोई कोख ही नहीं पैदा हुई अभी तक, जो बुद्ध को धारण कर सके।

महामाया रही होंगी जिनकी कोख से बुद्ध पैदा हुए, कौशल्या रही होंगी जिनकी कोख से राम पैदा हुए, माँ देवकी रही होंगी जिनकी कोख से भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लिया। और तमाम महापुरुषों ने लिया। लेकिन कहा जाता है कि हम अवसर पैदा करते हैं, आत्मा प्रवेश करती है।

हमारे यहां मूर्ति पूजा का प्रचलन बहुत लोगों को कन्फ्यूज करता है कि क्यों है, कैसे है। मैं अपना एक छोटा-सा एनालिसिस बता रहा हूँ — जो आत्माएँ, जिन धर्मों के प्रवर्तक, शरीर के पार निकल जाएँ, जिन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। इस दुनिया में बहुत सारे धर्म हैं — जैसे इस्लाम, बौद्धिज्म, जैनिज्म, ईसाइयत, यहूदी। इतिहासकार बताते हैं कि करीब छोटे-बड़े मिलाकर इस पूरे पृथ्वी पर डेढ़ लाख से ज्यादा धर्म हैं, 3 लाख से ज्यादा सेक्ट हैं और उससे भी ज्यादा उप-सेक्ट हैं। मुसलमानों में 95 जातियाँ हैं। ब्राह्मणों में भी सरयूपारीण ब्राह्मण से लेकर गोत्र के आधार पर हजारों में विभाजन हैं। भूमिहार ब्राह्मणों में भी हजारों में विभाजन हैं। मैं उसकी तरफ नहीं जाऊँगा।

मैं कहना यह चाहता हूँ कि सिर्फ भारत भूमि में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मोक्ष की बात सिर्फ हिंदू धर्म और सनातन धर्म करता है। और सनातन धर्म और हिंदू धर्म जहां पैदा हुआ, वहीं पर बौद्धिज्म और जैनिज्म पैदा हुआ।

बुद्ध और महावीर ने भी मोक्ष की बात की, लेकिन सनातन हिंदू और बौद्ध, जैन के अलावा इस पूरे पृथ्वी, पूरे भूमंडल में किसी ने मोक्ष की बात नहीं की। सारे धर्म स्वर्ग और नर्क की सीढ़ी पर आकर फंस गए। इस्लाम भी स्वर्ग-नर्क की ही बात करता है और जो बाकी धर्म हैं, सब यहीं तक बोलकर रुक जाते हैं। सिख धर्म में नानक देव ने मोक्ष की बात की।

आखिर सभी धर्म स्वर्ग और नर्क की सीढ़ी पर क्यों फंस गए? सिर्फ एक कारण से कि हमारे सनातन धर्म को जो 11,000 साल की लंबाई और गहराई मिली, उतनी लंबाई और गहराई दुनिया के दूसरे धर्मों को नहीं मिली। इस्लाम 1400 साल पुराना है, ईसा मसीह लगभग 2000 साल, यहूदी धर्म 3000 साल, सिख धर्म 555 साल, जैनिज्म लगभग 3500 साल (बुद्ध और महावीर एक-दूसरे के समकालीन हुए)।

इन सारे धर्मों ने अगर मोक्ष की बात की, जो हिंदुस्तान में पैदा हुए, क्योंकि उनको 7000 साल की विरासत मिली। बाकी धर्मों को नहीं मिली, इसलिए बाकी धर्म स्वर्ग और नर्क की सीढ़ी तक जाकर फंस गए।

बाबू गेंदा सिंह की पुण्यतिथि के अवसर पर आज यह सभा आयोजित की गई है। बाबू गेंदा सिंह के सम्मान में एक-दो लाइन पढ़ूँगा, जो इस मंडल के, इस क्षेत्र के लोगों के जीवन को उन्होंने आसान किया, रास्ते कम किए:

तुम हमसफर थे इसलिए रास्ता भी कम पड़ा,
मंजिल भी आ गई, मुझे चलना भी कम पड़ा।

ऐसे महापुरुष मंजिल को आपके कदमों के पास ले जाकर खड़ा कर देते हैं।

इसी के साथ गेंदा बाबू के पुण्य चरणों में मैं प्रणाम करते हुए अपनी वाणी को विराम दूँगा। और जिन-जिन आयोजक मंडल में जिनका नाम मैं नहीं ले पाया, समझिए कि आप सबने मेरा इतना मन से स्वागत किया, मैं बहुत अभिभूत हूँ। यहां आकर मैं बहुत दिल की गहराइयों से आभारी हूँ आप सभी का। आप ऐसे आयोजन करते रहिए। लोगों के दिलों में अलख जगाते रहिए। तमाम पुराने महान विभूतियों को, जिन्होंने लोगों के जीवन और मंजिल को आसान किया है, जिन्होंने साध्य और साधन के बीच की दूरी कम की है।

जय हिंद, जय भारत।

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