सभागार में उपस्थित देवियों और सज्जनों।
‘चेंजिंग फेस ऑफ टीवी मीडिया’ मुझे लगता है कि इस समय का सबसे प्रासंगिक विषय है और होना भी चाहिए।
जब कोई चीज़ कितनी बदल चुकी है, कितनी संभावना है उसके और बदलने की और वह कहाँ तक पहुँचेगी — इसका मूल्यांकन करते समय हमें अवश्य अपनी आँखों के सामने गुज़रा हुआ समय और उसके पीछे का समय देखना पड़ता है।
मैं जिस पीढ़ी से ताल्लुक रखता हूँ, जब मैं बच्चा था और गाँव में रहता था, तो हमने दूरदर्शन वाला टीवी देखा। हमने चित्रहार देखा, उसी पर समाचार देखा, 1987 में रामायण भी देखी। गाँव में केवल एक ही टीवी हुआ करता था। रामायण के बाद दूसरा जो सीरियल मुझे याद है, वह चाणक्य पर था (चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी ने प्रोड्यूस किया था)। उसके बाद महाभारत की शुरुआत हुई। बी. आर. चोपड़ा जी का महाभारत इतना सुपरहिट हुआ कि खबरों की दुनिया ने कभी सड़कों पर सन्नाटा नहीं पसारा था, लेकिन जब महाभारत शुरू हुई तो रविवार को ऐसा लगता था मानो धारा 144 लग गई हो। इस तरह का माहौल होता था।
‘चेंजिंग फेस ऑफ टीवी मीडिया’ मुझे लगता है कि इस समय का सबसे प्रासंगिक विषय है और होना भी चाहिए।
जब कोई चीज़ कितनी बदल चुकी है, कितनी संभावना है उसके और बदलने की और वह कहाँ तक पहुँचेगी — इसका मूल्यांकन करते समय हमें अवश्य अपनी आँखों के सामने गुज़रा हुआ समय और उसके पीछे का समय देखना पड़ता है।
ये मैं वह बयान कर रहा हूँ जो मेरे ही छोटे से जीवन में गुज़रा, जो मैंने देखा, जो मैंने महसूस किया।
उसके बाद वह दौर आया — दूरदर्शन के बाद 1993 का — जब सोनी, ज़ी, सहारा टीवी जैसी कंपनियाँ आईं, जो प्रोडक्शन हाउस की तरह अपना काम शुरू करती हैं। सोनी टीवी एक मनोरंजन चैनल के रूप में आया। लेकिन टीवी मीडिया में दूरदर्शन के अलावा 24×7 स्लॉट था और दूरदर्शन पर न्यूज़ तब तक नहीं आती थी।
मैं बताना चाहूँगा, आप सब इसके साक्षी हैं (यहाँ जितने मेरे से आयु में छोटे हैं और बहुत सारे मेरे से बड़े भी हैं), सबने यह महसूस किया होगा कि करीब 30 से 35 साल में दुनिया पूरी तरह बदल गई। मैंने ई-फोरम के एक-दो संबोधनों में (कुछ लोग सुने भी होंगे) इस बात का ज़िक्र किया है कि इतिहासकारों ने पूरी दुनिया के विकास को मापा है — करीब 3 लाख सालों के विकास को दस्तावेज़ किया और उसे आठ-नौ हिस्सों में बाँटा गया है।
टीवी मीडिया के चेंज की अगर हम बात करें तो सभ्यता के बदलाव के साथ ही इसका भी होना चाहिए। क्योंकि सभ्यता के बाहर कोई टीवी मीडिया नहीं होता। उसी के साथ वह पलता है, पल्लवित होता है और आगे बढ़ता है।
पहला फेज़ था गेदरर-हंटर का, जब हम आम जीवों जैसे ही थे, बल्कि कह सकते हैं कि सबसे निरीह प्राणी थे। हम पृथ्वी पर कीड़े-मकोड़ों के बाद... दिन बहुत निकलने के बाद ही निकलते थे। महीनों में तीन-चार बार ही खाना मिलता था। सूर्यास्त होने से पहले आदमी पेड़ों पर छिप जाता था। आज की तरह कपड़े होते ही नहीं थे। हम सभी जीवों जैसे ही थे। बस अंतर इतना था कि जीव चार पैरों पर चलता था, आदमी खड़ा हो गया। और आदमी के खड़े होने ने बड़ी क्रांति पैदा की।
वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे दिमाग में जो तंतु हैं, करीब एक करोड़ तंतुओं को जोड़ा जाए तो बाल के बराबर मोटाई आती है। जानवर चार पैरों पर चलता है, उसके दिमाग में ब्लड फ्लो इतना तेज़ जाता है कि खड़े इंसान के दिमाग में जो तंतु बनते हैं, वे काम करते हैं। जानवरों के दिमाग में बनने से पहले ही टूट जाते हैं। इसलिए जानवरों का दिमाग वैसा विकसित नहीं हुआ जैसा मनुष्य का हुआ। यह पहला युग था।
दूसरा युग आया — जब आग का आविष्कार हुआ। आग के आविष्कार ने पूरी मानवता को नई दिशा दी और मनुष्य के चेहरे को, उसकी ताकत को बदलकर रख दिया। जिन शेरों, चीतों, हाथियों को देखकर आदमी बमुश्किल महीने में तीन-चार बार खाना खा पाता था, अब उस आग के बल पर आदमी ने सभ्यता बनानी शुरू की और बड़े-बड़े जानवरों को डराना भी शुरू किया। जानवर डरने भी लगे।
तीसरे युग में हम धीरे-धीरे समूह में रहने लगे। समूह के बाद गाँव का निर्माण हुआ। आदमी ने थोड़ा-बहुत सभ्यता के साथ जानवरों से अलग पहचान बनाई। आग के कारण पका कर खाना खाने लगा। उसके बाद सभ्यता थोड़ी उन्नत हुई। पहले युग से दूसरे में प्रवेश करने में, दूसरे से तीसरे में — करीब 50-60 हज़ार साल लगे। इतिहासकार बताते हैं कि दूसरे से तीसरे युग में प्रवेश करने में करीब 1 लाख साल लगे।
उसके बाद राजशाही आई — चौथे युग में। सभ्यता बहुत विकसित हो गई। आदमी ने अलग दुनिया बनानी शुरू की। छठे युग तक आते-आते जितना विकास 3 लाख सालों में हुआ, उतना अगले 3000 सालों में हुआ। इन तीन हज़ार सालों में जो विकास हुआ, वह अगले 300 सालों में हुआ। फिर जो अगले 300 सालों में हुआ, उसे मैं मानता हूँ कि अब 30 साल के अंदर होने जा रहा है। और जो पिछले 30 साल में घटा है, वह अब कुछ ही महीनों में होने की क्षमता मानव ने विकसित कर ली है।
इतिहासकार बताते हैं कि सेमी-इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन हुआ। आदमी ने मशीनें, कल-पुर्जे, फावड़ा, कुदाल जैसी बहुत चीज़ें हाथ से आविष्कृत कीं।
सातवें युग में पूरा इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन हुआ — फुल स्केल पर। अंग्रेज़ आए, 16वीं शताब्दी आ गई। 17वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों ने पूरे एशिया महाद्वीप पर धीरे-धीरे अपना प्रभुत्व बना लिया। भारत भी करीब 200 साल से ज्यादा की गुलामी में रहा (वैसे भारत की गुलामी का इतिहास बुद्ध-महावीर के बाद से ही माना जा सकता है), लेकिन अंग्रेज़ों की गुलामी को मैं सिग्निफिकेंट मानता हूँ। क्योंकि वह गुलामी भी थी और गुलामी के साथ अंग्रेज़ों ने भारत को बहुत कुछ दिया भी। हम अपनी सभ्यता, टेक्नोलॉजी, वेद-पुराण, माइथोलॉजी, ऋषियों के दिए ज्ञान को भूल चुके थे। 712 ईस्वी में जब मुहम्मद बिन कासिम आया था, तब से भी कुछ प्रभाव शुरू हो गया था।
सातवाँ युग ऐसा था जिसमें फुल स्केल पर इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन हुआ।
आठवाँ युग 19वीं-20वीं शताब्दी में आया, जब कंप्यूटर आए। कंप्यूटर के बाद सूचना क्रांति आई (यह आठवाँ और नौवाँ युग दोनों की बात थी)।
दसवाँ युग स्टार्टअप का चल रहा है। मैं इसमें एक नया हिस्सा जोड़ रहा हूँ — स्टार्टअप के बाद का, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का। यानी मैंने 3 लाख सालों के पूरे विकास को 11 हिस्सों में बाँट दिया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इंसान के सोचने के तरीके, काम करने के तरीके और उम्मीदों को परवान चढ़ाने की क्षमता को इतना बदल दिया कि हमने सोचा भी नहीं था।
अमेरिका की कंपनी एनवीडिया, जो चिप्स बनाती है, उसकी इकोनॉमी दुनिया के सैकड़ों देशों से ज्यादा हो चुकी है। 4 ट्रिलियन डॉलर का मार्केट कैप क्रॉस कर चुकी है। यानी अमेरिका की एक कंपनी अकेले भारत की पूरी अर्थव्यवस्था से बड़ी हो चुकी है।
ग्लोबल विलेज के जमाने में हम टेक्नोलॉजी से दूर नहीं रह सकते। दुनिया में कोई परिवर्तन हो रहा है तो हम उससे अछूते नहीं रह सकते। कोई टॉपिक तीन-चार शब्दों में होता है, लेकिन उसकी व्याख्या विस्तृत होनी चाहिए। लोग कहते हैं कि 1986 में भारत की अर्थव्यवस्था भी एक ट्रिलियन डॉलर की थी और चीन की अर्थव्यवस्था भी लगभग एक ही ट्रिलियन डॉलर की थी। लेकिन 1986 से अब तक के सफर में देखें तो चीन की इकोनॉमी आज 18-19 ट्रिलियन डॉलर के पार जा चुकी है (कुछ अनुमानों में 20 ट्रिलियन के करीब), जबकि हमारी इकोनॉमी 4.5 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है और 5 ट्रिलियन डॉलर के टारगेट पर है।
मैं खुद से यह सवाल करता हूँ और खुद ही इसका उत्तर भी दे रहा हूँ कि ऐसा कैसे हुआ और क्यों हुआ होगा। जिस भारत ने पूरी दुनिया को अंतरिक्ष का ज्ञान दिया, ज्योतिष का ज्ञान दिया, गहरी सभ्यता दी, गणित का ज्ञान दिया — वही भारत इतना कैसे पिछड़ गया?
मैं इसका मूल्यांकन करता हूँ तो कोई बहुत गूढ़ या गहरी बात नहीं कहूँगा। मैंने एक बहुत साधारण-सी बात पकड़ी कि हम क्यों पिछड़ गए... हमारे यहाँ और पश्चिम में एक मूलभूत अंतर है। पश्चिम में नियम है कि आदमी एक दिन चर्च जाता है, पूजा करता है और फिर जा पड़ता है। वह इसके फेर में नहीं फँसता। हमारे यहाँ क्या है? बचपन से पूरी जनरेशन को यही सिखाया जाता है और अभी भी सिखाया जा रहा है कि धन, पैसा, रुपया — ये सब मोह-माया है। किसी बाबा जी के पास चले जाइए, वे आपका दुख हर लेंगे। उनको अपने दुखों का पता नहीं कि वे खुद कितने दुख में हैं, फिर दूसरों के दुख क्या हरेंगे?
लेकिन एक पनपती हुई आबादी, एक आकार लेती हुई तरुणाई, एक प्रतिभावान जेनरेशन जो इस देश के पास है — उसको हमारे यहाँ एक धारणा ने जीते-जी मुर्दा कर दिया। सोचने की उसकी सारी शक्ति छीन ली उससे।
भला हो इस देश का कि इतनी बड़ी आबादी है। गृहयुद्ध इसलिए नहीं छिड़ता कि 'हैव' और 'हैव नॉट' के बीच इतनी खाई होने के बावजूद इसका एक फायदा भी है — लोग राम पर छोड़कर चादर तानकर रात को सो जाते हैं। इसीलिए बाकी दुनिया के समाजशास्त्री जब इंडिया की सोसाइटी पर अध्ययन करते हैं तो उन्हें बड़ा आश्चर्य होता है।
मैंने यह समझा कि आज एक अमेरिकी एंटरप्रेन्योर एलन मस्क अगर 5 साल के अंदर ट्रिलिनियर हो गया, तो हम 70 फीसदी युवाओं की आबादी रखने वाले देश 5 ट्रिलियन के टारगेट तक पहुँचने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं?
कहानी यह बताती है कि एक बहुत बड़े स्वर्णकार थे। वे कहीं यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में एक व्यक्ति मिला, जो अपने गधे के गले में एक चमकदार पत्थर लटकाए हुए था। वह गधे पर कुछ सामान ले जा रहा था। स्वर्णकार भी व्यापार के लिए जा रहे थे। दोनों रास्ते में मिले। स्वर्णकार की नजर पारखी थी — उन्होंने दूर से ही देखकर समझ लिया कि गधे के गले में लटका यह चमकदार पत्थर हीरा है। उन्होंने ऑफर दिया कि "तुम 50 आने ले लो और यह पत्थर मुझे दे दो।" तो उसने कहा, "मैं 50 पैसे में क्यों दूँ भाई? पीछे तो एक आदमी 1 आना दे रहा था। मैंने उससे 2 आने माँगे थे। और आप इसे 50 पैसे में लेना चाहते हो?"
इस बात पर स्वर्णकार ने कहा, "ठीक है, तुम नहीं देना चाहते तो मत दो। लेकिन यह साधारण-सा पत्थर मैंने 50 पैसे में लगाया है — यह भी बहुत है। पछताओगे तुम।"
दोनों एक ही रास्ते जा रहे थे। थोड़ी दूर बाद स्वर्णकार को कौतुहल हुआ। उन्होंने पलटकर देखा कि जिस गधे के गले में पत्थर लटका था, वह अब नहीं है। फिर स्वर्णकार ने गधे के मालिक से पूछा, "वो पत्थर क्या हुआ?" उसने कहा, "एक आदमी ने 10 आने में खरीद लिया। यह तो मेरी समझ से ज्यादा मिल गया। मैं तो अधिकतम 2 आने ही माँगे थे। उसने मेरे माँगे से पहले ही 10 आने दे दिए।"
स्वर्णकार की चालाकी उसके मुँह से निकल पड़ी, "अरे मूर्ख! वो करोड़ों रुपए का हीरा था। उतना बड़ा हीरा तो मैंने देखा ही नहीं था। तुमने 10 आने में दे दिया!"
तो उस अनपढ़, सीधे-सादे आदमी ने कहा, "महोदय, आप तो पढ़े-लिखे कुलीन मालूम होते हैं। मैं तो उस हीरे को पत्थर ही समझकर घूम रहा था। मुझे इसका बोध नहीं था कि वह पत्थर है या हीरा है। लेकिन आपकी बुद्धि को क्या कहें? आपको तो पता चल गया था, और पता चलने के बाद भी आपने उसकी कीमत 50 पैसे लगाई। तो मुझे अपने ऊपर तरस नहीं आ रहा, मुझे आपके ऊपर तरस आ रहा है कि जानने के बाद आपने क्या किया।"
यह कहानी मैंने इसलिए सुनाई कि देश में सारे बुद्धिमान लोग, सारे पढ़े-लिखे लोग — कहीं मंच पर बैठ जाएँ और कहीं उन्हें डंडा चलाने का अधिकार मिल जाए, तभी व्यवस्था में परिवर्तन किया जा सकता है। या फाइलों पर कोई फरमान साइन करने की योग्यता हासिल कर लें — यह जरूरी नहीं है। विचारों की कोई सीमा नहीं। उन पढ़े-लिखे, विचारशील लोगों के बारे में मैं क्या कहूँ जो जहाँ खड़े हैं, वहाँ से व्यवस्था बदलने की दिशा में काम नहीं करते। वे भी कम या ज्यादा उसी स्वर्णकार की तरह होते हैं — जो जानते तो हैं कि गधे के गले में हीरा लटका हुआ है, लेकिन उसकी कीमत 50 पैसे लगाते हैं। और इस 50 पैसे की मानसिकता ने आदमी के पूरे जीवन को, उसकी पूरी सोचने की धारणा को इस कपट ने हिंदुस्तान के समाज में बदलकर रख दिया है, गिरा दिया है।
इससे ऊपर उठने की थोड़ी जरूरत है, जो मुझे लगता है।
आज के समय में टीवी का चेहरा कैसे बदल रहा है? मैं तो यह मानकर चल रहा हूँ कि टीवी चैनल का एक ओनर होने का मौका मुझे मिला। लंबे समय तक इस इंडस्ट्री में काम करने का अवसर मिला। मैंने 1997 में अखबार ज्वाइन किया था — लखनऊ में राष्ट्रीय सहारा। तब मैं ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर में था। काम भी करता था, क्लास भी करता था और नौकरी भी करता था। वहाँ से शुरुआत हुई। 16 नवंबर को मैंने अपने कैरियर का 28वाँ साल पूरा किया।
इन 28 सालों में जो सफर मैंने देखा — पहले अखबार टीवी से बहुत पावरफुल था, बहुत स्थापित माध्यम था। उसके बाद जब टीवी आया, 2000 में आजतक लॉन्च हुआ 28 दिसंबर को। उसके बाद एनडीटीवी और स्टार न्यूज का अलगाव हुआ और 2002 में रिक्रूटमेंट हुआ था। हम लोगों का स्टार न्यूज के लिए। तब मैंने पहली बार प्रिंट मीडिया को छोड़ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रवेश किया। वहाँ से यह पता चला कि अब नया माध्यम टीवी है और टीवी ही आपका भाग्य बदल सकता है।
मुझे भी मोटिवेशन मिला, मैंने वॉक-इन इंटरव्यू दिया। मेरा सिलेक्शन हो गया। फिर दो साल स्टार न्यूज में रहा, फिर एक साल सीएनबीसी में रहा, फिर स्टार न्यूज में आया जो अब एबीपी न्यूज हो गया है।
16 नवंबर 2009 को मुझे सहारा ग्रुप के पूरे नेटवर्क को — जिसमें टीवी, अखबार, चैनल सब शामिल थे — हेड करने का मौका मिला। लगभग 15 साल मैंने उस नेटवर्क के साथ सीईओ, एडिटर-इन-चीफ, ग्रुप सीओओ, एडिटर-इन-चीफ की तरह काम किया। तब तक मैं कह सकता हूँ कि 2000 तक और 2000 से 2020 तक बेशक टीवी एक बहुत पावरफुल माध्यम था। लेकिन अभी जो एक-दो सालों में परिवर्तन आया है, वह कमाल का आया है।
सोशल मीडिया ने और सोशल मीडिया से जुड़े आम लोगों ने इतनी ज्यादा हिस्सेदारी दिखाई है कि मैं मानता हूँ — टीवी मीडिया धीरे-धीरे रिडंडेंट हो रहा है। मार्केट में व्यूअरशिप बहुत तेज़ी से गिर रही है। एड रेवेन्यू बहुत तेज़ी से समाप्त हो रहा है। अब सही अर्थों में टीवी का पूरा बिजनेस मॉडल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल मीडिया ने पहले ही टेकओवर कर लिया है।
मेनस्ट्रीम मीडिया अपनी जिम्मेदारियों से इसलिए भी पिछड़ रहा है क्योंकि जितनी सहभागिता सोशल मीडिया ने अपनी उपलब्धता के कारण आम आदमी के हाथों में ताकत दी है, जो पावर दी है, जो उनकी उम्मीदों को परवान चढ़ाया है — वह एक नई क्रांति है।
जैसे मणिपुर वाली घटना का उदाहरण मैंने कहीं और दिया था, लेकिन दोबारा कहूँगा:
3 मई 2023 को दो महिलाओं को नग्न करके सड़क पर घुमाया गया। मेनस्ट्रीम मीडिया वहाँ डेरा डाले हुए था, लेकिन किसी ने उस खबर को नहीं दिखाया। एक अनजान व्यक्ति ने बहुत विनम्रता से दो लाइन लिखकर डाल दी। सोशल मीडिया की ताकत देखिए — संसद का स्पेशल सत्र बुलाया गया, लोगों के बीच उबाल आया, 65,000 पैरामिलिट्री फोर्सेस डिप्लॉय की गईं और व्यवस्था को बदलने, लोगों को सांत्वना देने के पूरे प्रयास हुए।
ऐसा उबाल बहुत लंबे समय से मैंने किसी और स्टोरी के कारण नहीं देखा, जो टीवी पर चली हो — पिछले 5 सालों में। हाँ, टीवी पर जो घटना हो जाती है, उसे हम दोबारा अच्छे पैकेजिंग में, फ्लेवरी लैंग्वेज में दिखा देते हैं। लेकिन सोशल मीडिया टीवी से आगे निकल गया क्योंकि वहाँ जो जैसा है, उसी क्षण में उपलब्ध है।
टीवी में भी ब्रेकिंग न्यूज का चलन था, लेकिन ब्रेकिंग न्यूज चलाने के लिए थोड़ा आयोजन तो करना पड़ता है। न्यूज गेदरिंग डिपार्टमेंट को देनी पड़ती है, प्रोसेस होकर आउटपुट में जाती है, फिर पीसीआर में, फिर स्क्रीन पर। इसमें पूरा मैकेनिज्म लगता है। सोशल मीडिया आपके एक क्लिक दूर है। टीवी कितना भी फास्ट हो जाए, सोशल मीडिया से फास्ट नहीं हो सकता।
यही सबसे बड़ा परिवर्तन है — अब वही सर्वाइव करेगा जो आपकी हथेली के बराबर आकार का होगा। और जिस हथेली के बराबर की चीज़ में आप कंटेंट फिट करके नहीं दे पाए, तो आपका बिजनेस मॉडल फेल हो जाएगा।
आज के जमाने में एक बहुत अच्छा अवसर आया है — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण। बड़े स्क्रीन से छोटे स्क्रीन का इंटीग्रेशन संभव हो रहा है। जिन लोगों ने इस दिशा में छलांग लगाई, वे मार्केट में टिके रहेंगे। जो इस अवसर को जाने दे रहे हैं, वे पिछड़ जाएँगे।
और मैं आपको बता दूँ — आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यहीं नहीं रुकेगा। छोटी-मोटी चीज़ें तो आपने अनुभव की ही होंगी — सोशल मीडिया, इंस्टाग्राम आदि कीवर्ड पकड़कर विज्ञापन दिखाने लगता है। आपकी बात रिकॉर्ड नहीं करता, लेकिन चुने हुए शब्दों से आपका माइंडसेट समझ लेता है।
मैंने पढ़ा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत बायस्ड भी है। जैसे कोई औरत पूछे कि मैंने व्हाइट नेल पॉलिश लगाई है, तो वह उसकी खूबियाँ जबरदस्त तरीके से बताएगा। चाहे चैटजीपीटी हो, पर्प्लेक्सिटी हो, ग्रोक हो — जो आप पूछते हैं, उसी के अनुसार परोसता है।
करेक्शन हर चीज़ में आता है। जैसे शेयर बाजार बहुत ऊपर चढ़ जाए तो धड़ाम से गिरता है। एआई में भी करेक्शन आएगा, लेकिन एआई बहुत मजबूत बनकर रहेगा।
कुछ घटनाएँ बता रहा हूँ:
क्या है कि चैटजीपीटी, परपेक्सिलिटी, ग्रोक आदि से लोग मेडिकल एडवाइज लेने लगे। अमेरिका में कुछ लोगों ने डिप्रेशन में आत्महत्या कर ली और सुसाइड नोट में लिखा कि चैटजीपीटी ने ठीक से गाइड नहीं किया। परिवार ने चैटजीपीटी पर केस किया।
गूगल और मेटा ने एआई प्लेटफॉर्म्स पर केस किया, क्योंकि वे कहते हैं — हमने दुनिया सजाई, केबल बिछाई, सैटेलाइट लगाए, तुम हमारा डेटा एब्स्ट्रैक्ट कर रहे हो, हमारा बिजनेस नीचे जा रहा है।
अमेरिका में स्टार्टअप के लिए अलग नियम हैं। चैटजीपीटी ने कहा — हम नई कंपनी हैं, स्टार्टअप हैं। गूगल के वकीलों ने कहा — आप स्टार्टअप हो, लेकिन मार्केट कैप में आप हमसे आगे निकल रहे हो। स्टार्टअप की परिभाषा बदलनी चाहिए।
अब एआई और ओल्ड मीडिया के बीच, न्यू मीडिया और टेक कंपनियों के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। बिजनेस में दौड़ तो है ही। मेरी नजर में बिजनेस बहुत सरल है — 1 रुपया लगाते हैं और 2 रुपए कमाने की उम्मीद रखते हैं। इस सफर में बहुत सारी चीज़ें आ जाती हैं।
अपनी बात समाप्त करने से पहले कुछ जरूर कहना चाहूँगा:
अखबार बंद हो जाएँगे — इस पर बहुत बहस हुई। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, वेबसाइट्स आईं। लेकिन अखबार भी चल रहे हैं। हाँ, कोविड के बाद बहुत बड़ा बदलाव आया। टाइम्स ऑफ इंडिया जैसा अखबार कमोडिटी प्रोडक्ट बन गया। 80 के दौर में पैदा हुए लोग आज भी सुबह अखबार देखना चाहते हैं। मैं खुद रोज़ एक नजर देखता हूँ।
कोविड में सबने पीडीएफ कॉपी से काम चलाना शुरू किया। लाखों सर्कुलेशन वाले अखबारों का सर्कुलेशन हजारों में आ गया। अब स्केल टेक्नोलॉजी की तरफ जा रहा है। कोई अखबार अब सर्कुलेशन बढ़ाना नहीं चाहता।
टीवी चैनल की व्यूअरशिप बढ़नी चाहिए — हर मालिक चाहता है। लेकिन अब उसकी व्यूअरशिप सोशल मीडिया या एक वायरल रील से आगे नहीं जा सकती। टीवी की सीमा आ गई है। सोशल मीडिया का डेटा एआई से बेहतर कोई प्रोसेस नहीं कर सकता।
स्टार्टअप का कॉन्सेप्ट इसी से आया — इतने रिसोर्स पैदा हो गए कि बुद्धिमान व्यक्ति इन्हें जोड़कर नई चीज़ बना लेता है। टीवी का पूरा फेस आने वाले दिनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आने से पूरी तरह बदल जाएगा। मोबाइल के बियॉन्ड कोई स्क्रीन रहेगी तो फंक्शन, शादी या इवेंट में वीडियो वॉल के रूप में देखी जाएगी।
घरों में न्यूज़ देखने का चलन कम हो गया क्योंकि न्यूज़ देखने की जरूरत ही नहीं पड़ती। टीवी चालू करने से पहले मोबाइल में सारी खबर आ जाती है — ऐप्स से, गूगल से।
अब टीवी जैसी व्यवस्था, बड़ी स्क्रीन, ब्रेकिंग न्यूज़ का हंगामा समाप्त हो चुका है। मैं कह रहा हूँ — एक साल में बड़ी स्क्रीन समाप्त हो जाएगी। टीवी बनाने वाली कंपनियों के सामने अब चुनौती है कि वे अब किस बिजनेस में जाएँ। 35 साल पहले टीवी का युग था, जब सीरियल देखने की जरूरत थी — वह सब समाप्त हो गया। न्यू एज में आपका मोबाइल ही आपका सबसे बड़ा साथी है। वही आपके साथ चलेगा, वही आपके साथ टिकेगा, वही आपके साथ रहेगा।
थैंक यू सो मच। जय हिंद।